हैदराबाद से बाहर एमआईएम ने युं ही नहीं पसारे पांव-सेकुलर पार्टियों से मायूसी ने बढ़ा दिया ओवैसी का सियासी क़द

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(शिब्ली रामपुरी)
भाजपा की बी टीम और चुनाव में भाजपा को फ़ायदा पहुंचाने के मक़सद से चुनावी मैदान में उमीदवारो को उतारने से लेकर आरएसएस के इशारे पर काम करने जैसे आरोप जिस नेता पर अक्सर लगते हैं उसका नाम असदउद्दीन ओवैसी है.
ऑल इण्डिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन (mim)के अध्यक्ष ओवैसी कई बातों के लिए जाने पहचाने जाते हैं. देश की आज़ादी से पहले की उनकी पार्टी है लेकिन ओवैसी के पिता के समय तमाम प्रयासों के बावजूद भी ये पार्टी हैदराबाद से बाहर पहुंच नहीं बना सकी लेकिन असदउद्दीन ओवैसी के हाथ में कमान आने के बाद इस पार्टी ने अपने पंख हैदराबाद से बाहर फैलाने आरम्भ किए और इसको कुछ कामयाबी महाराष्ट्र में मिली तो ओवैसी मुस्कुरा उठे और फिर ये बिहार में इस बार पांच सीटों पर कामयाब हुई है.

वो सवाल जो उठ रहे हैं
बिहार विधानसभा चुनाव में mim के 5 प्रत्याशी सफ़ल हुए हैं जिससे ओवैसी पूरे जोशो खरोश में हैं और उन्होंने पश्चिम बंगाल और यूपी के चुनाव में भी मज़बूती से उतरने की घोषणा की है. ओवैसी की कामयाबी पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि
ओवैसी के बिहार में 20 सीटों पर चुनाव लड़ने से महागठबंधन को हार मिली. कहा जा रहा है कि ओवैसी ने बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए ये सब किया. बंगाल में भी ओवैसी यही करने जा रहे हैं वग़ैरा वग़ैरा आरोप ओवैसी पर हैं. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने तो बिहार चुनाव के दौरान ही ओवैसी को भाजपाई तोता बताया था. अब कांग्रेस नेता तारिक़ अनवर भी इसी तरह की बातें बोल रहे हैं.
सियासत में ओवैसी की बढ़त की क्या सिर्फ़ यही वजह है?
हैदराबाद से बाहर महाराष्ट्र और अब बिहार के विधानसभा चुनाव में mim के इस फैलाव की वजह यदि गंभीरता से तलाश की जाए तो पता चलता है कि ओवैसी की तक़रीर/भाषण वग़ैरा की वजह से ये सब नहीं हुआ बल्कि ख़ुद को सेकुलर कहने वाली राजनीतिक पार्टियों से मायूसी ने mim को मज़बूत किया. ये कहना ग़लत नहीं होगा कि ख़ुद को मुसलमानों का बड़ा हमदर्द बताने वाली और बीजेपी का ख़ौफ़ दिखाकर वोट लेने वाली पार्टियों से लोगों की मायूसी और निराशा ने राजनीति में ओवैसी जैसे नेताओं को मज़बूत किया है. वरना जब तक इन पार्टियों पर भरोसा रहा तब तक ओवैसी या mim के तमाम प्रयास कामयाबी नहीं पा सके थे. जिस तरह से दिल्ली में आम आदमी पार्टी को भी वहां की जनता ने एक विकल्प के तौर पर चुना उसी तरह mim के साथ भी हुआ. ओवैसी जैसे नेताओं ने इस मायूसी का ख़ूब फ़ायदा उठाया और नतीजा आज सामने है. जहां तक भाजपा की बी टीम के आरोपों की बात है तो इस बारे में पुख़्ता तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी. ये मैदाने सियासत है कुछ भी हो सकता है. हालांकि ओवैसी इस तरह के आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताते हुए कई सियासी पार्टियों को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं.

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