जन्मदिन–बशीर बद्र का जिक्र किए बगैर उर्दू गजल की बात नहीं हो सकती

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15 फरवरी 1935 में जन्में इस सहज और सरल शायर ने उर्दू गजल को नया लहजा व नया अंदाज दिया। मशहूर गजल सिंगर जगजीत सिंह अपने हर कार्यक्रम इनका जिक्र करते थे। उन्होंने बशीर साहब की गजलों को खास एलबम्स में अपनी आवाज दी जो बहुत पसंद की गईं। आज भी,वक्त से पहले इस दौर की शायरी कहकर खामोशी इख्तयार करने वाले बद्र का जिक्र किए बगैर उर्दू गजल की बात नहीं हो सकती।बशीर साहब की बेगम तैयबा बद्र बताती हैं इन दिनों वे कुछ चीजें और नाम भूलने लगे हैं। थोड़ा बहुत ही चलते फिरते हैं। घर से बाहर निकलना बंद कर दिया है। मेरे पसंदीदा शेरों में उनका एक शेर यह है-

वो धूप छप्पर हों या छांव की दीवारें

अब जो भी उठाएंगे मिलजुलकर उठाएंगे

उनका एक शेर जो हमेशा याद रहता है-

जिस दिन से चला हूं मेरी मंजिल पे नजर है

आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।

इन दिनों स्थानीय मुशायरों में बशीर साहब के छोटे साहबजादे राहत बद्र अपने वालिद की गजलों को उन्हीं के लहजे में सुना रहे हैं। जो काफी पसंद किया जा रहा है। नौ जवान शायर बद्र वास्ती कहते हैं की बशीर साहब ने वक्त से पहले ही इस वक्त की शायरी कह दी है और यह दौर उन्हीं का दौर है। उन्हीं की एक गजल का शेर है-

वो गजल की सच्ची किताब है

उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो।

दशकों तक उर्दू शायरी में बादशाह की हैसियत रखने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र की याददाश्त जवाब दे गई है…किसी शख्स को भी पहचानना उनके लिए मुश्किल है… लेकिन जब उनके कान में उनके शेर फूंके जाते हैं तो वे अधूरे शेरों को पूरा कर देते हैं.आजकल बशीर साहब की दिनचर्या क्या है? राहत कहती हैं बस शायरों वाली दिनचर्या है। रात को जागना, दिन को सोना। रात का सन्नाटा गहराते ही बशीर साहब को मुशायरों के दिन याद आने लगते हैं क्योंकि अक्सर मुशायरे रात में ही होते हैं। यही वह वक्त होता है जब हम उन्हें उनके शेर सुनाते हैं और अक्सर मिसरा वो ही पूरा करते हैं।

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